ब्रह्मवाणी वेदों मे समाहित ज्ञान

इस सृष्टि की सर्वोत्तम वस्तु ज्ञान है। ज्ञान के द्वारा ही हम जीवन के विस्तार को समझ सकते है। जब ईश्वर ने सृष्टि निर्माण का संकल्प लिया तो उनकी प्रेरणा से सर्वप्रथम ब्रह्माजी प्रगट हुऐ, जिन्हे ब्रह्मांड की उत्पति और सृजन का कार्य दिया गया। ब्रह्माजी ने कई हजार वर्षों तक परमेश्वर की आराधना की, उनकी तपस्या के फल स्वरूप ईश्वर ने उन्हे ज्ञान प्रदान किया। 

इसलिए सर्वप्रथम जो ज्ञान ब्रह्माजी की के मुख से प्रगट हुआ वही वेद के रूप मे परिवर्तित हो गया। इस लिए वेदों को ब्रह्मवाणी कहां जाता है। वेदों की उत्पति कब हुई इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। इस ज्ञान को सप्त ऋषियों ने ब्रह्माजी से प्राप्त किया और उनसे अन्य ऋषियो को प्राप्त हुआ। समय-समय पर ऋषियों ने इस ज्ञान को साधारण मनुष्यों तक पहुंचाने के लिए कलमबद्ध किया। इसलिए वेद कब लिखे गए इसका कोई स्पष्ट आकलन नहीं है। 

द्वापर युग के अंत मे महऋषि वेदव्यास ने सभी वेदों और पुराणों के विस्तारित स्वरूप को संक्षिप्त रूप प्रदान किया, ताकि साधारण मनुष्य के लिए उसका अध्यन करना सरल हो जाए। इसीलिए आधुनिक शोधकर्त्ता वेदों की आयु लगभग 6000 B.C मानते है। जबकि वास्तव मे यह उसके संक्षिप्त किये जाने का समय है, वेद तो उससे कही अधिक पुराने है, इसलिए कोई भी वेदों की आयु का प्रमाण नहीं दे सकता।

संसार मे उपस्थित सभी धर्म ग्रन्थ मानव जीवन की उत्पति के बाद रचे गये, परंतु सनातन वेद तो मानव की उत्पति से पहले ही प्रगट हो गये थे। इसलिए हम वेदों को समस्त धार्मिक ग्रंथो का आधार भी मान सकते है। वेदों मे समाहित ज्ञान को चार भागों मे विभाजित किया गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इनमे ऋग्वेद को प्रथम वेद का स्थान दिया गया है।

वेद पुरातन ज्ञान-विज्ञान का अथाह भंडार है। इसमें मानव की हर समस्या का समाधान समाहित है। वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। 

वेदों को अनेक उपवेदो में भी विभक्त किया गया है। ऋग्वेद को आयुर्वेद, यजुर्वेद को धनुर्वेद, सामवेद को गंधर्ववेद और अथर्ववेद को स्थापत्यवेद, में बाटा गया है। वेदों के चार विभाग है: ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। जिसमे ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई है। 

वेदों के प्रकार 

ऋग्वेद: 

ऋग्वेद को प्रथम वेद की उपाधि प्राप्त है। इसे पद्य शैली (कविता के रूप में) लिखा गया है। ऋग्वेद में 10 मंडल, 1028 सूक्त, 10580 ऋचाये हैं। ऋग्वेद: ऋक शब्द रूप से बना है जिसका अर्थ ‘ज्ञान और स्थिति’ का दर्शन है। इस ग्रंथ में सभी देवताओं के आवाहन मंत्र,  देवलोक में उनकी स्थिति और कार्य के बारे में बताया गया है।

इसके साथ ही ऋग्वेद में हवन चिकित्सा, जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, मानस चिकित्सा की जानकारी भी दी गई है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त की जानकारी भी मिलती है, जिसमें सभी प्रकार की प्राकृतिक दवाओं के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसमें 125 प्रकार की दिव्य औषधियों के बारे में भी बताया गया है, जो इस पृथ्वी पर 107 स्थानों मे पाई जाती हैं। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा अवस्था प्राप्त करने की कथा को भी सम्मलित किया गया है।

यजुर्वेद: 

यजुर्वेद  शब्द यत् + जु = यजु से मिलकर बना है। यत का अर्थ ‘गतिशील’ और जु का अर्थ ‘आकाश’ होता है। इसलिए यजुर्वेद का अर्थ आकाश में निरंतर गतिशील होने से है। इसमें श्रेष्ठ कर्म करने पर बल दिया गया है। यजुर्वेद में यज्ञ करने की विभिन्न प्रकार विधियों और उनके प्रयोगो के बारे में बताया गया है। इसमे तत्व विज्ञान के बारे में भी बताया गया है। 

ब्राह्मण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ इनका विस्तार पूर्ण ज्ञान इसी वेद मे मिलता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें सम्मलित है।यजुर्वेद की दो महत्वपूर्ण शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत में और शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित है। यजुर्वेद में कुल 18 कांड और 3988 मंत्र हैं। ‘गायत्री मन्त्र’ और ‘महामृत्युंजय मन्त्र’ का मुख्य स्रोत्र भी यजुर्वेद को ही माना गया है।

सामवेद: 

सामवेद साम शब्द से बना है इसका अर्थ रूपांतरण, संगीत, सौम्यता और उपासना होता है।सामवेद में ऋग्वेद की रचनाओं को संगीतमय रूप में प्रस्तुत किया गया है। सामवेद को गीतात्मक (गीतों के रूप में) लिखा गया है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। गीता उपदेश के समय भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं को सामवेद की संज्ञा दी थी। इसमें 1824 मंत्र हैं जिसमें इंद्र, सविता, अग्नि जैसे देवताओं का वर्णन है। सामवेद की 3 शाखाएं हैं। इसमें 75 ऋचाये हैं।

अथर्ववेद: 

अथर्व शब्द थर्व + अथर्व शब्द से मिलकर बना है। थर्व का अर्थ ‘कंपन’ और अथर्व का अर्थ ‘अकंपन’ होता है।इसलिए ज्ञान के द्वारा श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। 

यही अथर्ववेद का मूल आधार है। इस वेद में रहस्यमई विद्याओं, चमत्कार, तांत्रिक मंत्रो,

अथर्ववेद आठ खंड में विभाजित है। जिसमे भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते हैं।

आयुर्वेद जड़ी बूटियों का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इसमें कुल 20 अध्याय है, जिनमें 5687 मंत्र हैं।

वेदों का हमारे जीवन मे बहुत गहरा महत्व है। वेदों हमें विभिन्न प्रकार की जानकारियां प्रदान करते हैं।

वेदों शास्त्रों में मनुष्य के चार पुरुषार्थो का वर्णन मिलता है।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनमे धर्म के लिए प्रातः काल अर्थ के मध्य काल और काम के लिए रात्रि का विधान बताया गया है। इन तीनों पुरुषार्थो का पूर्ण पालन करने पर ही मनुष्य चौथे पुरुषार्थ मोक्ष को प्राप्त कर लेता है

इसलिए सभी जातियों के लिए के लिए अलग-अलग काम निर्धारित है।

ब्राह्मणों का मुख्य काम वेदों का अध्ययन करनाl

यज्ञ करना, पुरोहित और पुजारी का काम करना l

क्षत्रियों का मुख्य काम युद्ध करना, लोगों की रक्षा करना है।

वैश्य का मुख्य काम व्यापार करना, इसके अलावा पशुपालन, खेती, शिल्प और दूसरे व्यापारों भी वैश्य कर सकते है।

शूद्रों का काम केवल सफाई करना है।

जबकि इसके विपरीत मनुस्मृति में स्पष्ट रूप से ये कहा गया है-

‘जन्मना जायते शूद्रः

संस्कारात् भवेत् द्विजः।

वेद-पाठात् भवेत् विप्रः

ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।’

अर्थात:- ‘जन्म से सभी मनुष्य शुद्र उत्पन्न होते है, संस्कार ग्रहण करने से द्विज (ब्रह्मण) बनते है, वेदों के पठन-पाठन से विप्र बनते है, और जो ब्रह्म के वास्तविक अर्थ को समझ लेता है, वह ही असली ब्राह्मण कहलाता है।’

वेदों का निष्कर्ष

इसलिए सनातन पद्धति मे जाति व्यवस्था के लिए कोई स्थान नहीं है, वो वर्ण व्यवस्था का समर्थन करती है। जिसमे सभी प्राणी अपनी क्षमताओं के आधार पर अपने व्यवसाय का स्वतंत्र चुनाव कर सकता हैl

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